
सारंगढ़-बिलाईगढ़। ग्राम पंचायत चुनाव को अब एक साल पूरा होने जा रहा है, लेकिन जिले की ज्यादातर पंचायतें अब भी विकास कार्यों के इंतजार में हैं। चुनावी मंचों पर सरपंचों ने बिजली, पानी, सड़क और स्वच्छता जैसे मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता देने का वादा किया था, पर बीते एक साल में यह वादे धरातल पर उतरते नजर नहीं आते। इसी वजह से ग्रामीणों के बीच असंतोष बढ़ रहा है और लोग खुलकर कह रहे हैं—“चुनाव से पहले वादा, बाद में सब आधा।”
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विकास कार्यों का सूखा, फाइलें कागजों में कैद
जिले की कुछ ही पंचायतों को 10–15 लाख तक के काम मिल पाए हैं, वह भी बेहद सीमित रूप में। कई पंचायतें ऐसी हैं जिन्हें 5–10 लाख के कार्य भी स्वीकृत नहीं हुए, जबकि कुछ को अब तक एक भी काम नहीं मिला। सरपंचों की स्थिति यह है कि विकास कार्यों की फाइलें मंजूरी के लिए बीडीओ, डीडीसी, जनपद, जिला पंचायत, कलेक्टर कार्यालय और यहां तक कि विधायक–सांसद तक के कार्यालयों में चक्कर काटते-काटते अटकी हुई हैं।
ग्रामीण पूछते हैं—“कहां है विकास?”, वहीं सरपंच भी दबे शब्दों में केवल इतना कह पा रहे हैं कि “फाइल भेज दी गई है… काम आएगा”, पर ज़मीनी हकीकत अलग है।
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मनरेगा और अन्य मद लगभग ठप
पिछले कार्यकाल में महामारी के दौरान भी मनरेगा के माध्यम से पंचायतों को भरपूर काम मिला था, लेकिन इस बार स्थिति उलट है। मनरेगा से लेकर अन्य पंचायत मद तक लगभग सूने पड़े हैं। जहां पहले पंचायतों को करोड़ों के काम मिल जाते थे, वहीं अब फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं।
काम न मिलने से कई पंचायत प्रतिनिधि आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव दोनों झेल रहे हैं। गांवों में छोटे–मोटे विकास कार्य भी रुके हुए हैं।
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डबल इंजन सरकार, पर विकास की स्पीड धीमी
राज्य और केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के बावजूद सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में विकास की रफ्तार उम्मीद से कम दिखाई दे रही है। हालांकि धान खरीदी, महतारी वंदन और प्रधानमंत्री आवास योजना में सरकार का बजट मजबूत है, लेकिन बाकी क्षेत्रों में प्रगति की गति धीमी होने से ग्रामीण क्षेत्रों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
फिर भी सरपंचों और ग्रामीणों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में रफ्तार बढ़ेगी और बुनियादी सुविधाओं को लेकर परेशानियाँ कम होंगी।

