
सारंगढ़। क्षेत्र के जंगलों में शिकार की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ताज़ा मामला बरमकेला वन परिक्षेत्र के ग्राम कपरतुंगा से सामने आया है, जहाँ एक भालू का शिकार कर उसके अवशेष तालाब में फेंक दिए गए। ग्रामीणों ने जब तालाब में खाल, बाल और सिर तैरता देखा तो मामले का खुलासा हुआ।
सूचना पर पहुँची वन विभाग की टीम ने डॉग स्क्वॉड की मदद से जांच की और दो आरोपियों जुगलाल सिदार और ज्योति राम सिदार को गिरफ्तार किया है। सूत्रों का कहना है कि इस पूरे शिकार कांड में दर्जनों लोग शामिल हो सकते हैं।
पुराने मामले भी आए सामने
इससे पहले भी क्षेत्र में बाघ और तेंदुए के शिकार की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। अब भालू के शिकार ने एक बार फिर वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग केवल कागज़ी कार्रवाई करता है, जबकि शिकारी गिरोह बेखौफ़ होकर जंगलों में सक्रिय हैं।

संरक्षण कानून और लापरवाही
वन्यजीव संरक्षण कानून सख्त होने के बावजूद लगातार शिकार की घटनाएँ होना विभाग की लापरवाही और मिलीभगत की ओर इशारा करता है। आरोप है कि विभाग हर बार नीचे स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामले को दबा देता है, जबकि वरिष्ठ अधिकारी बच निकलते हैं।
उठ रहे अहम सवाल
क्या वन विभाग केवल शिकार के बाद औपचारिक गिरफ्तारी और प्रेस नोट तक सीमित है? लगातार तीन बड़े शिकार मामलों के बावजूद विभाग की अंदरूनी जांच क्यों नहीं हुई? क्या शिकारी इतने प्रभावशाली हैं कि उन्हें वन विभाग का कोई डर नहीं है?

यदि हालात यही रहे तो आने वाले समय में जंगलों से बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे दुर्लभ प्राणी लुप्त हो सकते हैं। अब देखने वाली बात होगी कि इस मामले में और कितनी गिरफ्तारियाँ होती हैं और क्या वाकई विभाग अपनी नाकामी की जिम्मेदारी तय करता है या फिर मामला हमेशा की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

